Tuesday, October 4, 2011

human being

i am not much of a smoker,
but i do smoke
i am not much of a drinker,
but i do drink

i am no longer a virgin,
but i am no whore
i still respire and aspire,
to live more

i see the world through my eyes
from the shallow rivers...to the skies

there's something everywhere,
if not...there's air
but, still in my eyes
an emptiness' there

i dont want the eternity,
nor i want to be alone
i wanna be no urchin
nor i awe the king's throne

am an ordinary person
living an ordinary life
having no grandeur or spice
with harmony in hearts and no strife

searching for a li'l love...peace
and no other thing
being a human
i wanna be a human being

Saturday, August 6, 2011

व्योम

जिंदगी की इन चार दीवारों के परे
है एक खुला मैदान...
दिन रात के इस पहलु से दूर
है एक खुला आसमान...
मुझे वही जाना है.

बैर, द्वेष, ग्लानी या गम
इन सब से परे है एक करम...
पाप- पुण्य, जनम और मरण
इनके ऊपर है एक धरम ...
मुझे वही  अपनाना है.
 
 ये मोह-माया, कोई अपना कोई पराया
इन सब छलावो से दूर..
यह धूप, यह छाया; क्या रूह, क्या काया
इन सब बाह्य दिखावो से दूर...
मुझे मुक्ति को पाना है

"हम" से बाँटते हर "मैं" को छोड़
 हर "अहम्" को "हम" बनाना है

मुझे उस "व्योम" को पाना है!!!


  
   



  

Sunday, August 15, 2010

क्यों आजकल सुबह भी सुबह नहीं होती...



क्यों आजकल सुबह भी सुबह नहीं होती....
होता है सब उजला , पर रोशनी नहीं होती....

दिन ढलने पर भी जब शाम धुंधली नहीं होती,
फिर चाँद निकलने पर क्यों चहुँ ओर चांदनी नहीं होती 
क्यों आजकल सुबह भी सुबह नहीं होती...

हवा है, प्रदूषित सही, पर है
साँस लेता हूँ, चाहूँ या न चाहूँ, साँस लेता हूँ
पर क्यों ये साँसें जीवन से भरी नहीं होती
क्यों आजकल सुबह भी सुबह नहीं होती...

समाज है, समाज मे इंसान भी है
और सब के चेहरों पर एक हलकी मुस्कान भी है  
पर क्यों किसी से मिलने पर 'दिल' मे ख़ुशी नहीं होती

क्यों आजकल सुबह भी सुबह नहीं होती...

न जाने क्यों
कुछ भारी सा है, कुछ तनाव है
बातचीत होती तो है, फिर भी एक खिचांव है
बातों मे दिखावा होता है...क्यों अपनेपन की मिश्री घुली नहीं होती
क्यों आजकल सुबह भी सुबह नहीं होती...

व्यक्ति है, पर व्यक्तित्व नहीं
सत्य होगा बेशक, पर सत्व नहीं
बस तत्व की तमन्ना है, आँखों मे संतुष्टि की चमक नहीं होती 
क्यों आजकल सुबह भी सुबह नहीं होती...

क्यों... 

Sunday, June 6, 2010

बस, एक हौंसला है!!

दूर मंजिल है, राह लम्बी है
कोइ जरिया नहीं
बस, एक हौंसला है!!

कदम कदम पर भटक जाता हूँ
जतन करता हूँ, फिर लौट आता हूँ
नए मौड़ से शुरू करता हु फिर ये सफ़र ....जिसका
कोइ जरिया नहीं

बस, एक हौंसला है!!

धीरे धीरे चलता हूँ, सूरज संग जलता हूँ
शाम होती है ठहरता हूँ
सुबह फिर निकलता हूँ
कोइ जरिया नहीं

बस, एक हौंसला है!!

समय की गति तेज़ है, धीमी गति है मेरी
यु ही चलता रहा तो, कही हो न जाये देरी
यही सोच घबराता हूँ
पर फिर थोडा आगे निकल जाता हूँ
उस सफ़र पर जिसका
कोइ जरिया नहीं

बस, एक हौंसला है!!

आज...
बहुत थक गया हूँ
पीछे मुड़ देख रहा हूँ...
की कहा था मैं और कहा हूँ मैं
पर पाया
की जहां था मैं, वही हूँ मैं

ये तो एक कतरा मात्र है...
उस राह का जिसका
कोइ जरिया नहीं

बस, एक हौंसला है!!

एक दिन वो घडी भी आयेगी
ये राह ख़त्म हो जाएगी
मंजिल मेरे सामने होगी, मेरा हाथ थामने होगी

बस यही ख्वाब देखने को,
कुछ देर रुका हूँ
कल फिर चल दूंगा
उसी सफ़र पर जिसका
कोइ जरिया नहीं

बस, एक हौंसला है!!

Sunday, May 16, 2010

मेरी आँखें

दूर पवन के वेग से.... हिलते हुए वो सूखे पत्ते
आँधियों की धूल  से .... अश्रु लाती हुई वो पलके
पानी की एक बूँद को .....तरसते हुए वो सूखे पत्ते
उस मुसलाधार बारिश मे....भीगते मेरे हसीं सपने
पतझड़ की मिटटी से ...ढके हुए वो सूखे पत्ते
सावन मे भी पतझड़....देखती मेरी ये आँखें
उस हरियाली से उजाड़ कर...बनाये गए ये सूखे पत्ते
वो सुनहरी सपने छीन कर .....बनाई गयी मेरी वीरान ऑंखें
प्यार के एक कोमल स्पर्श से...हो जायेंगे हरे ये पत्ते
प्यार की ही एक झलक देखकर....चमक उठेंगी फिर ये ऑंखें!!!!

Tuesday, March 23, 2010

फीकी होली : missing 'you'

ये होली लगी कुछ फीकी

लाल, हरा, गुलाबी, पीला
सतरंगी रंगों से था हर कोना रंगीला
इन सब रंगों के बीच भी
था किसी एक रंग की तलाश में
मैं था किसी क संग की आस में

ये होली लगी कुछ फीकी


                                                        
दोस्त थे यार थे, सभी नाते रिश्तेदार थे
इस होली की बारिश में, हर तरह के फ़व्वार थे
फिर भी मैं था प्यासा
था किसी और ही ढंग की प्यास में
मैं था किसी के संग की आस में

ये होली लगी कुछ फीकी



होली का हुडदंग था, थे ढोल और नगाड़े
मस्ती की टोलियों में झूम रहे थे सारे
इस उत्साह में भी, मैं था हताश
था किसी और ही उमंग की तलाश में
मैं था किसी के संग की आस में

ये होली लगी कुछ फीकी

रंग लगा है अब भी इन हाथो मैं, जिन में थामी है कलम
सोचता हूँ  कौन है वो "किसी", या फिर है ये कोई भरम
हूँ एक पशोपेश में
हूँ एक मनघडंत विश्वास में.....
पर फिर भी
मैं  हूँ किसी के संग की आस में

ये होली वाकई लगी कुछ फीकी

Tuesday, March 16, 2010

.तनहाई : show me the meaning of being lonely

the only english song I can listen to n number of times...there are many fans of the song too,
here I have tried to express, loneliness, in form of my poem..may not be as great as the song..

कितना तनहा हो गया मैं आज

थोडा सा बेबस थोडा सा लाचार
जीवन की ये कैसी मझधार
जो, सब छोड़ चले मेरा हाथ.....


कितना तनहा हो गया मैं आज
वो जो कुछ ख्वाब थे मेरे
रातों को बहलाते, याद आते सवेरे
खैर, अब नींद ही नहीं तो कैसे ख्वाब.....

कितना तनहा हो गया मैं आज



परछाई मेरी, परछाई की तरह साथ देती थी
उजाले मे तो वो भी पास रहती थी
पर, आज हुआ क्या ज़रा सा अन्धकार....

कितना तनहा हो गया मैं आज